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बुधवार, 5 अगस्त 2009

दास्तां महिला कैदियों की
मेरी किताब सलाखों में सिसकती सांसे की पहली कड़ी

लगभग पांच साल पहले राजस्थान पत्रिका के परिवार परिशिष्ट में मैंने महिला कैदी नाम से एक कॉलम लिखा। इस कॉलम में बीस महिला कैदियों की जिंदगी से जुड़े कई पहलू जानने की कोशिश की। हर हफ्ते एक महिला कैदी से मुलाकात का सिलसिला लगभग पांच माह तक चला। मेरी यह सीरीज अब एक किताब सलाखों में सिसकती सांसे के रूप में आ चुकी है। अब मैं अपने ब्लॉग पर इस किताब से लूंगा एक एक महिला कैदी की दास्तां।

मां ने सुला दिया मौत की आगोश में
तीन वर्षीय मासूम बालिका नेहा का कोई गुनाह नहीं था। वह तो खुश थी कि उसे नई मां मिली है। यह मासूम मन तो इससे भी बेखबर था कि उसको जन्म देने वाली मां तो दुनिया से रुखसत हो चुकी है। वह अपनी नई मां के साथ खुश थी और बचपन की खुशियां बांट रही थी। यह बेचारी नन्ही जान नहीं जानती थी कि नई मां के रूप में आई यह महिला ही उसकी इहलीला खत्म कर देगी। उस नन्ही कली को खिलने से पहले ही मसोस देगी। ऐसा ही हुआ। नई मां मनभर ने उस मासूम बच्ची को गला घोंटकर मौत के घाट उतार दिया। वजह सिर्फ यही थी कि नेहा उसके पति की पहलïी पत्नी की औलाद थी और मनभर उससे नफरत करती थी। उस मासूम बाला की हत्या की आरोपी मनभर को उम्रकेद की सजा सुनाई गई। उदयपुर जिले के एक गांव में ब्याही गई मनभर की उम्र शादी के वक्त लगभग २० साल थी। उसका विवाह ऐसे व्यक्ति से हुआ था जिसकी पहली पत्नी मर चुकी थी। पहली पत्नी के एक बेटी थी। शादी के बाद से ही मनभर अपने पति की पहली पत्नी की बेटी नेहा से नफरत करती थी। वह उसे बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। साथ ही उसके मन में था कि उसके पति का प्यार सिर्फ उसी के लिए हो। यह प्यार बेटी के रूप में भी न बंटे। इसी बदनियति के चलते मासूम बालिका नेहा मनभर की आंखों का कांटा बनी रही। एक दिन तो इस नफरत की भी हद हो गई। मनभर ने रस्सी से उस बच्ची का गला घोंटकर उसे मौत के घाट उतार दिया। मनभर के ऊपर सवार हुए नफरत के भूत ने उसे हत्यारिन बना दिया। वो भी एक नन्हीं कली का। सौतेली मां की नफरत की शिकार नेहा हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गई। यह घटना मनभर की शादी के एक वर्ष बाद की ही है। वह बच्ची को अपने वैवाहिक जीवन में भी रोड़ा मानती थी। मनभर का गुनाह छिप नहीं सका और वह बच्ची की हत्या की मुजरिम करार दी गई। उसे हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई गई। वह हर खुशी से महरूम हो गई और मजबूर हो गई जेल की कोठरी में जिंदगी गुजारने को। जेल की सजा के दौरान शाम होते ही अन्य महिला कैदियों के साथ वह बैरक में बन्द हो जाती थी। उसके गुनाह का ही नतीजा था कि उससे उसके अपने ही कन्नी काटे हुए थे। ससुराल में उसके सास- ससुर, पति व तीन जेठ थे और पीहर में माता- पिता व तीन भाई । इसके बावजूद वर्षों तक जेल में उससे मिलने कोई नहीं आया। उसके साथ बन्द महिला कैदियों के कई रिश्तेदार उनसे मिलने आते थे, लेकिन उसने तो जेल आने क बाद अपनों का पिछले कई वर्षों से मुंह तक नहीं देखा था। यह उसके गुनाह और बदनियति का ही अंजाम था कि उसे जिल्लत भरी जिंदगी गुजारनी पड़ रही थी। जेल से छूटने के बाद वह कहां जाएगी? इस सवाल पर वह फिर सोचने लगती और धीरे से बोलती 'मां- बाप के पासÓ। वह समझ चुकी थी कि ससुराल के दरवाजे उसके लिए हमेशा के लिए बन्द हो चुके हैं। उसका वैवाहिक जीवन मात्र साल भर का रहा और जेल का जीवन? यहां मनभर एक पात्र है नफरत का, जिसने इक मासूम बालिका की जान लेकर न केवल अपना जीवन बिगाड़ लिया, बल्कि ससुराल व पीहर वालों की खुशहाल जिन्दगी को भी तबाह कर दिया। नफरत व क्रोध के हावी होने को ही दर्शाता है यह दर्दनाक हादसा।

1 टिप्पणी:

Mera Akash ने कहा…

Chand Bhai, ummeed ke mutabik aapki kalam ne ek baar phir mere man ko chhoo liya. is post ki sabse badi khasiyat hai .iske peeche chupi apki nekniyat. bhalaa kaun kaid mei siskati zindagi ke baare mei sochata hai .Ab app mere reading list mei hai ,to apko padna aasaan ho gaya hai.
Raksha Bandhan ki shubh kamna kubool kijiye...

Pratima Sinha